Labels

Showing posts with label हिन्दी. Show all posts
Showing posts with label हिन्दी. Show all posts

Saturday, 2 May 2020

कलयुग का मनुष्य



क्यों पर पीड़ा को देख मनुज,
तुम नयनों से नीर बहाते हो,
दुर्गम से मार्ग के पथिक से,
अपनों सा स्नेह दिखाते हो।

जब रक्त किसी का बहता है,
तुम्हारा हृदय व्यथित होता है,
किसी भूखे मनुष्य को पाकर,
निवाला नहीं गटका जाता है।

तुम निर्धनता को जानते हो,
तुम निर्बलता को मानते हो,
पर हे मनुज तुम फ़िर भी प्रतिदिन,
मलीनता मिटाना जानते हो।

तुम हो वही शोषित वर्ग,
तुम हो वही मज़दूर सही,
जो स्वयं अभावों में जीकर,
एक बूँद से तृप्त हो जाता है।

तुम देख किसी मानव को,
अपने जैसा प्रसन्न हो जाते हो,
हैं भले लोग संसार में अब भी,
यह मान धन्य हो जाते हो।

हे मनुज तुम्हारे जैसों को,
ब्रह्मा ने था वरदान दिया,
विष्णु ने था गुणगान किया,
था महेश ने भान किया।

जब द्वापर, त्रेता, सतयुग,
धरती से सब लुप्त हो जाएगा,
जब घोर कलयुग आएगा,
जब मानवता का नाश हो जाएगा।

जीवन मूल्य रहेंगे तब भी,
निर्धन, दानी, धनी, निशाचर,
किसी योनि में भेद नहीं रह जाएगा,
जो भी इनमें किसी और का होगा।

जो औरों को साथ उठाएगा,
जो पर पीड़ा को हृदय लगा,
मन से सन्ताप हटाएगा,
बस वो मनुष्य कहलाएगा,
बस वो मानव रह जाएगा।

Friday, 1 May 2020

ज्वार भाटा



उससे कुछ कहना है मुझे,
वो जो रात को मिलने आती है।

दबे पाँव सहमी हुई सी पहले,
दिन भर जो ज्वार भाटे सी उबलती है,
शाम ढलते प्रवाह में बहा ले जाती है।

एक रौद्र रूप लेकर वो,
मेरे तकिये के नीचे से खिसककर,
मेरे कानों में गरजती है।

मैं सोचती हूँ शायद कोई वहम है,
वो रात तक अथाह वेग लिए आती है।

मैं उखड़ती साँसों से लड़ती हूँ,
डूबती हुई तैरने लगती हूँ।

लहरों में उठती गिरती मैं,
किनारे का रास्ता ढूँढ़ती हूँ।

वो कहती है किनारे तक पहुँचना है,
तो लहरों से लड़ो,
मन के उस वेग को,
रोको मत, बस उड़ेल दो।

मैं थक चुकी हूँ,
उनींदी आँखें, बेचैन मन,
रोज़ का यही सिलसिला।

अब और नहीं होता मुझसे,
मेरी रगों से स्याही बहती है,
जब शब्द टपकते रहते हैं।

पर मन कहता है,
क्या होगा इससे,
तुम दिनकर नहीं हो,
ना ही तुम हो निराला,
कोई क्यों पढ़ेगा इसे।

क्या रोज़ यही उल्टी करना,
इतना कैसा उद्वेग है,
जब किसी का ये उद्गार नहीं,
जब तुम्हें पता व्यापार नहीं,
कैसे शब्दों को बेचोगी,
तुम्हें नए दौर का ज्ञान नहीं।

मैं शब्दों को पट पर उड़ेलकर,
साँस गहरी लेती हूँ,
मुझे नए दौर का भान नहीं,
पता कविता का व्यापार नहीं।

पर रूह से स्याही निकलती है,
तो मन को सुकून मिल जाता है,
उस वेग में बहती रहती हूँ,
लहरों में टूटकर जुड़ना आता है।

अब पौ फ़टने वाली है फ़िर,
आज की रात स्याही ख़त्म हुई।

किनारा दिखने लगा है मुझे,
बत्ती की लौ बुझ रही है,
सुबह की रोशनी हो रही है,
मैं नींद में उस कविता के उबाल को,
शान्त होता देखती हूँ।

अब नींद मुझे आ जाएगी,
कल रात फ़िर वो आएगी,
रूह से स्याही फ़िर बहेगी
मुझे लहरों में बहा ले जाएगी।

Wednesday, 29 April 2020

मौन शोर



कई दिनों से भाग रहा है मन,
आज इसे कुछ देर ठहरने दो।
रात काली शान्त हो चली है,
ज़रा हृदय का शोर गूँजने दो।
धरातल पर सब गतिमान है,
भीतर उथल पुथल मचने दो।
रेंगती हुई हवा में शंकाओं की बेड़ियों को,
आत्ममंथन की लौ में धीरे धीरे पिघलने दो।
यूँ सुकून तो हर क्षण दे रही है प्राणवायु,
आज मुझे उद्वेग की लहरों में तैरने दो।
इस धुँधली खिड़की के उस पार,
मन झाँक रहा है अनगिनत कल्पनाओं में।
लिखता हूँ अक्सर तारामंडल की कहानियाँ,
आज अपनी कहानी तरंगों में सुनने दो।
हवाओं से भेजता हूँ संदेश कई दिशाओं में,
आज हवा का झोंका बनकर उड़ने दो।
मैं शायद कई चेहरों से मिलता हूँ प्रतिदिन,
आज अपने अबोध मन से परिचय करने दो।
आज मन को कुछ देर ठहरने दो,
रात में हृदय का शोर गूँजने दो,
धरातल के भीतर उथल पुथल मचने दो।

Thursday, 23 April 2020

The Art And The Artist

नोट: इस कविता का केवल शीर्षक अँग्रेज़ी में है, क्योंकि यही बिना भाषा बदले उपयुक्त लगा इसकी भावना में।



"यकायक जीवन के किसी मोड़ पर
वो मुस्कुराता हुआ मिलेगा",
किसी ने वर्षों पहले कहा था।
मैं उसे ढूँढ़ते हुए इस वीरान मोहल्ले में पहुँची,
सुना था आजकल वो बहुत ग़मगीन है,
तबियत सुस्त रहती है, साँसें टूटने लगी हैं।
पुरानी सँकरी गली के अन्त में देखी,
एक झोपड़ी जिसका छप्पर टूटा था,
अंदर पानी रिस रहा था,
एक तिरछी चारपाई पर वो लेटा था,
कदमों की आहट सुनकर चौंक गया।

"क्या काम है मुझसे? कौन हो?",
लड़खड़ाती बूढ़ी आवाज़ ने पूछा।
"मैं एक कलाकार हूँ,
आपको ढूँढ़ रही थी कब से।"
"सब मर गए हैं क्या?", उसने तल्ख़ ज़बान में पूछा।
"आप मर रहे हैं क्या?", मैंने भृकुटी तानकर पूछा।
वो खाँसते हुए हँसा और बोला,
"अच्छा तो तुम हो बताओ क्या चाहिए?"

"कला मर रही है, साहित्य तड़प रहा है,
सब पैसों के ठेकेदार हो गए हैं,
कोई सच्चा साहित्य नहीं पढ़ता अब,
साहित्य के रखवाले माया में लीन हैं,
जो दिखता है वही बिकता है,
काव्य कब का विलुप्त हो गया है,
कहानियाँ घुट घुट कर बिगड़ रही हैं,
जीवन देने वाला अब ज़हर उगल रहा है,
कला का स्वरूप अब कलाकार तोड़ रहा है,
मैं विवश हूँ क्या करुँ अब घोर निराशा छाई है,
दुनिया में नित नया रचता द्वेष भला नहीं लगता,
कलम उठाने को अब मेरा हृदय नहीं कहता |"

"कला कहाँ मर रही है", वो दैत्यों सा हँसकर बोला,
"कौन सी कला संकट में है,
क्या कुछ लोगों का साहित्य ही कला है,
अरे वह तो अनंत काल तक रहेगी,
वह 7 अरब रूप लेकर दुनिया में घूम रही है,
हर इन्सान के भीतर जन्म लेकर रह रही है।
कभी मिल जाती है किसी को अपनी कला,
और वो महान बन जाता है उसे पाकर।
कभी ढूँढ़ ही नहीं पाता कोई उसे,
और वो अंदर ही दब जाती है उसकी मृत्यु तक।"

"पर वह तो खो रही है आजकल",
मैंने बीच में टोका।

"हर इन्सान की अपनी कहानी है कला,
हर आदमी का अपना मोक्ष है साहित्य,
कोई टॉलस्टॉय बन गया,
कोई प्रेमचन्द हो गया,
किसी ने प्रेम पर काव्य लिखा,
किसी ने युद्ध को लाल रंगा,
कोई आकाश की कल्पनाओं में ऊँचा उड़ा,
कोई ज़मीन पर संघर्ष के सत्य में गड़ा,
काफ़का बना कोई भावनाओं में,
दिनकर बना कोई घटनाओं में,
कला इतनी बार जन्मी,
और फ़िर जब जब इन्हें पढ़ा गया,
वो बढ़ती रही, कभी मरी नहीं,
और हर बार जब कोई कलम उठाएगा,
वो जन्म लेती रहेगी।

साहित्य तड़प रहा है क्योंकि
कलाकार का अहम् ऊपर उठ गया है।
वो अब भी कुलबुला रहा है,
सच्चाई से लिखे जाने को।
बस उसका कोई अपमान ना कर दे,
वो फ़िर से लहलहाएगा।
बस तुम याद रखना वो नाज़ुक है,
हर किसी का अपना साहित्य है।
जो किसी की कला है वो तुम्हारी नहीं,
जो तुम्हारी कलम का रंग है वो किसी और का नहीं,
कलाकार की तरह रंगो उसे,
वो मरती नहीं है, तुम्हें हर रूप में मिलेगी।"

"और आप?", मैंने धीरे से पूछा।
उसके चेहरे की झुर्रियाँ गायब हो रही थीं,
उठकर बैठा और बोला,
"लो मैं भी फ़िर से जाग गया,
मैं तुम्हारा साहित्य हूँ, लिख डालो फ़िर से।"

दूरदर्शन और 90 के दशक की पीढ़ी



लॉकडाउन घोषित होने के 3 दिनों के भीतर ही दूरदर्शन ने रामायण कार्यक्रम दिखाना शुरु कर दिया। लक्ष्य था सामान्य जनता को लॉकडाउन के समय में धैर्य रखने, शान्त रहने में मदद करना। और कुछ हद तक यह काम भी आया। लोग ऑफ़िस की भाग दौड़ से छूटकर वैसे भी एक रूटीन बनाकर रह रहे थे। इसी रूटीन में सुबह 9 बजे और रात को 9 बजे रामायण देखने का सिलसिला लोगों की दिनचर्या में जुड़ गया। बिल्कुल वैसे ही जैसे आज से करीब 30 वर्ष पहले लोग अपने टेलीविज़न के सामने बैठकर नियत समय पर इंतज़ार करते थे अपने पसंदीदा कार्यक्रमों का। कुछ ऐसा माहौल होता था उस ज़माने में कि दर्शक घर में सबके साथ बैठकर सारे काम छोड़कर ना सिर्फ़ इन्हें देखते थे बल्कि बाद में उन पर चर्चा भी होती थी।

अब रामायण में तो ऐसी बहुत सी बातें हैं जिन पर चर्चा हो सकती है क्योंकि रामायण तो सीख देने वाले अनेक प्रसंगों से भरी हुई है। दूरदर्शन ने दर्शकों की nostalgia वाली नब्ज़ को पकड़कर 90 का दशक वापस ला दिया। महाभारत, ब्योम्केश बख्शी, चाणक्य, शक्तिमान, बुनियाद, सर्कस, देख भाई देख और कई ऐसे कार्यक्रम (और Amul के पुराने ऐड्स भी) जिनका 90 के दशक में बोलबाला था, जिन्हें देखकर दर्शक खुद को उनसे जुड़ा हुआ पाते थे, दूरदर्शन ने सभी का प्रसारण शुरु किया और दर्शकों को पुराने दिनों की दुनिया याद आ गई।

अभी कुछ ही दिनों पहले एक मित्र से बात हो रही थी तो अनायास ही मुँह से निकला कि nostalgia एक बहुत ही strong emotion है, इसे वही समझ सकता है जो उस पल इसे महसूस कर रहा हो। सबसे बड़ी बात यह है कि nostalgia एक महासागर के समान है, जिसमें आप एक बार अपने पैर का अँगूठा डालकर देखेंगे और फ़िर लहरें आपको कहीं बहुत दूर किसी ऐसे समय में ले जाएँगी जो आप अभी तक याद नहीं कर पा रहे थे। तो दूरदर्शन का पुराने कार्यक्रम दिखाना दर्शकों को ना सिर्फ़ टेलीविज़न के कई और धारावाहिकों जैसे सी हौक्स, उड़ान, फौजी, बेताल पचीसी, कैप्टन व्योम, श्री कृष्णा, मालगुड़ी डेज़ की याद दिलाता है वरन् ऐसे एक ज़माने का जब जीवन बहुत सरल था। उस समय किसी प्रकार के pressure में आकर Netflix पर लोग यूँ ही सीरीज़ नहीं देखते थे।

"दिल ढूँढ़ता है फ़िर वही फ़ुरसत के रात दिन..."

ग़ालिब की वो शायरी सुनकर सर्दियों की दोपहर ज़रुर याद आती है जब आम के पेड़ से हल्की हल्की छनकर आती धूप में चटाई पर किताब पढ़ते हुए लेटे रहते थे, और छिली हुई मटर मिलती थी चुपके से। घर के बड़े शाम को फ़ुरसत के पल चाय पीते हुए साथ बैठकर बातें करते हुए बिताते थे, बच्चे शाम को घरों से बाहर निकला करते थे खेलने के लिए, दोस्तों से मिलना जुलना होता था, किताबें खरीदने दुकान जाना होता था, और वो जहाँ चाचा चौधरी, सुपर कमांडो ध्रुव, नागराज, बिल्लू जैसी कॉमिक्स का उभरता दौर था, वहीं उन दिनों प्रेमचंद की कहानियाँ, रामायण, महाभारत, इतिहास और दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त की कविताएँ शौक के लिए पढ़ी जाती थीं। रात को बिजली गुल हो जाने पर या तो कहानियाँ सुनाई जाती थीं या रेडियो पर पुराने गीत सुने जाते थे।

छुट्टियों में दादी-नानी के घर जाना होता था, रिश्तेदार सिर्फ़ शादियों में नहीं मिलते थे, पड़ोसियों से मिलना जुलना रोज़ होता था, फ़ोन के कॉन्टैक्ट्स 500 होने पर भी बात करने वाला कोई ना हो ऐसा नहीं होता था और त्योहार सिर्फ़ घर में मनाकर सेल्फ़ी लेने तक सीमित नहीं थे, बल्कि हर साल दीवाली की सफ़ाई में पुरानी चिट्ठीयाँ मिला करती थीं। फ़ोन या तो लैंडलाइन होते थे जिन पर बात करने का समय निर्धारित करके सब वहीं इकट्ठा हो जाते थे या फ़िर लोग चिट्ठीयाँ लिखकर जवाब का इंतज़ार 10-15 दिन करते थे और जवाब मानो कुबेर के खज़ाने से कम ना था। यात्राएँ करके लोग वृत्तांत और जीवन के अनुभव एक दूसरे को सुनाते थे और कभी किसी ब्लॉग पर लिखने की ज़रुरत नहीं होती थी। एक सहज जीवन की धूमिल छवि पीछे याद करने पर स्वप्न्लोक की भाँति दिखाई देती है जो अब किसी बड़े शहर में भागते हुए जीवन में खो गई है। यह बहुत बड़ा कारण है कि अब लोग 90 के दशक में वापस जाने के लिए तरसते हैं।

क्या आपने कभी गौर किया है कि 90 के दशक का ये nostalgia सबसे ज़्यादा उन लोगों को क्यों महसूस होता है जिनका बचपन '85 से लेकर '99 तक बीता है? दरअसल हमसे पहले की पीढियाँ उसी सरल ज़माने में जीते हुए जिम्मेदारियों में बँध गईं और देखते ही देखते समय बदल गया। उनके समय में आराम से पढ़ाई करके नौकरी ढूँढ़ना और एक सहज ज़िन्दगी जीना ही काफ़ी था। हमारे बाद Boomers या Late Millennials की पीढ़ी आ गई जिन्होंने बचपन से ही कंप्यूटर, Y2K, टेक्नोलॉजी, कई टेलीविज़न चैनल्स और मोबाईल फ़ोन की दुनिया देखी और फ़िर घोर कॉम्पिटिटिव माहौल में बड़े हुए जहाँ उन्हें हॉबी क्लास और peer pressure जैसे शब्दों के द्वारा दूसरे बच्चों से मिलने का मौका मिला जिसमें समय की कमी जैसा कांसेप्ट उन्हें बड़ा ही सामान्य लगता है। उन्हें पता ही नहीं है 90 के दशक का ज़माना।

बीच में हम हैं जिन्होंने बचपन उस सरल 90 के दशक में बिताया और बड़े होकर टेक्नोलॉजी के साथ आगे बढ़कर भाग दौड़ वाले एकाकी जीवन में खो गए। हमने दोनों ही दुनियाँ देखी हैं। तो यहाँ सिर्फ़ हमारी ही पीढ़ी है जो एक तरफ़ घर के बड़ों को मोबाईल और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना सिखाने और Late Millennials की पीढ़ी को पुरानी दुनिया में झाँकने देने के बीच की कड़ी हैं। और ये हमारी ही ज़िम्मेदारी है कि हम इस कड़ी का रोल अच्छे से निभाएँ क्योंकि ये जो emotion है ये हमें ही hit करता है सबसे ज़्यादा।

यही कारण तो है कि जब हम 90 के दशक के लोग अब जीवन में 2020 तक पहुँचकर अपनी भागती ज़िन्दगी से सुकून चाहते हैं तो ये जो wanderlust जैसे hashtag अब प्रचलित हैं ये हमें पुराने लगते हैं और हम अनायास ही अपने बचपन के ज़माने में चले जाते हैं, क्योंकि हमारे लिए वो बीती दुनिया हमारा अपना एक खोया हुआ हिस्सा है जिसे हम मृगमरीचिका की भाँति किसी तरह फ़ुरसत के पल में ढूँढ़ते हैं। आपने The Viral Fever का नाम सुना होगा। इस प्लेटफॉर्म पर इसी वजह से बहुत सी सीरीज़ अत्यधिक पसंद की जाती हैं क्योंकि इनमें कुछ जगहों पर वही सहजता दिखाए जाने की कोशिश की जाती है। वह खोया हुआ हिस्सा ना सिर्फ़ हमारे बचपन का, हमारी मासूमियत का होता है बल्कि वे सभी जीवन मूल्य जो अब भी हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा हैं और इस बदलते परिवेश में हमारी मानवता को ज़िन्दा रखते हैं, उनका भी प्रतिनिधित्व करता है। और उन सभी मानवीय मूल्यों को समाज में जीवित रखने का ज़िम्मा इसी 90 के दशक की nostalgia से ग्रस्त पीढ़ी का है।

तो अगली बार जब nostalgic होकर अपने उन सभी हिस्सों को ढूँढ़ें तो 90 के दशक से कुछ सरल जीवन मूल्य लाकर अपने व्यस्त जीवन में अपने आस पास स्थापित करने का प्रयास अवश्य करें। यही आपके 90 के nostalgia की असली पराकाष्ठा होगी।

Monday, 13 April 2020

अंतर्द्वंद्व



चटक रही थी आग एक सर्द रात को,
जब वो ठिठककर ठहरी,
क्या बुतपरस्ती के किस्से,
क्या ख़्यालों के हिस्से,
क्यों मैं बर्फ़ से पिघलकर दुनिया में बहूँ |

मुसाफ़िर तो हूँ मैं चिनार-ए-दरख़्तों की,
अब ज़रा काहिली में ख़्वाब बुन लूँ |

ये हर दिन के उलझे अक्स जो सदियों से लिखते आए हैं,
रात की तारीख़ों पर कोई सुलझी सी इबारत लिख लूँ |

चंद्रगुप्त से शेर शाह तक जो रिवायतें बनी थी,
क्यों ना उन्हें फ़िर से जलते हुए शमशानों में गुलशन कर लूँ |

सफ़र पर रंजिशें तो बहुत मुकम्मल हुई हैं,
अब ज़रा मैं सन्नाटों को अख़्तियार कर लूँ |

बहुत तकल्लुफ़ किया है कि कफ़स जला दूँ या डुबो दूँ,
क्यों ना अब चमन को उजड़ने की फ़ुर्सत दे दूँ |

कई किताबें हैं सुनाती बीती सदियों के किस्से,
क्यों ना मैं अगले ज़मानों को रोशन कर लूँ |

थक गया है वजूद पहिए पर घिस घिसकर,
क्यों ना अब फ़ुर्सत से दो-चार उम्र जी लूँ |

यहाँ चिंगारियाँ लौ बनने को लड़ती हैं,
मैं राख से ही आँधियों में लपटें मयस्सर कर लूँ |

काग़ज़ पर लफ़्ज़ों से किस्से तो बहुत लिखे हैं,
अब ज़रा बर्फ़ पर सुकून-ए-फ़ेहरिस्त आबशार कर लूँ |

इतने सवाल पेश किए हैं कद्रदानों ने,
उन जवाबों की तलाश बादलों पर ना सही ज़मीन पर कर लूँ |

आईने से गुफ़्तगू-ए-शराफ़त तो बहुत की हैं,
अब ज़रा बेअदबी से कुछ सवाल कर लूँ |

बड़े मशहूर थे वो लोग जो चले गए,
मैं नामालूम होने से पहले अपना तारूफ़ कर लूँ |

महफ़िलों में शिरकत तो कई दफ़ा की हैं मैंने,
अब ज़रा ग़ज़ल-ए-तन्हाई गुलज़ार कर लूँ |


*************Translation Of Couplets For Non-Hindi Readers***************

 An unceasing explorer of the woods of birch and maple until this moment,
   I wish to weave my dreams of soothing repose in this moment.

 Every day has painted a tangled image since echoing centuries,
  I wish to compose a disentangled moonlit ballad in this moment.

 Strange norms have been followed by mighty emperors of past,
  I wish to water the gardens of burning graveyards in this moment.

 Many grievances have been carried on this journey till the end,
  I wish to absorb uncontrolled stillness in this moment.

 Perturbed over the fate of burning desires to be drowned or banished,
  I wish to let the flowerbeds bloom with peace in this moment.

 Several books have recited stories of ages long gone,
  I wish to enlighten the future civilizations in this moment.

 Exhausted existence shivers to spiral on the wheel of life,
  I wish to live a few more ages at leisure in this moment.

 Newborn sparks have waged wars to blaze till now,
  I wish to build my fire from ashes in this moment.

 The rush on the surface explodes inside trembling minds,
  I wish to melt the chains of uncertainties by introspection in this moment.

 Hundreds of words fusing into stories have been written on paper,
  I wish to pen a tranquil memoir on snow in this moment.

 Oh the questions that my companions have asked me,
  I wish to float to their answers on Earth in this moment.

 The mirror has reflected conversations of virtue with me,
  I wish to ask a few upfront questions in this moment.

 Those that departed left their footprints on the sand,
  I wish to know myself before getting forgotten in this moment.

 Congregations of enchanting melodies and poetry prevail,
  I wish to orchestrate a ghazal(an ode) of blissful solitude in this moment.

Thursday, 9 April 2020

मुर्दों का संसार




कई दोपहर आँख मूँदकर,
शीशम के उस पेड़ के नीचे,
यूँ ही ऊँघा करती थी।
बित्ते भर की एक गिलहरी,
टूटी टहनी से मिट्टी कुरेदती,
कल्पनाओं में उड़ती थी।
अलसाई सी धूप पड़े जब,
पत्तों में से लुक छुप कर,
नीले सफ़ेद आसमान के बादलों में से,
वो टुकुर टुकुर सूरज को तकती थी।
कोटर के आगे की दुनिया बड़ी अनोखी,
सुना था उसने कुट कुट करती,
पेड़ के ऊपर रहती चिड़िया से।
यहाँ बहुत ठहरी है ज़िन्दगी,
पंख होते तो उड़ जाती,
अक्सर सोचा करती थी।

************************

एक दोपहर आँख मूँदकर,
यूँ ही ऊँघ रही थी,
शीशम का वो पेड़ ना था,
कोटर के आगे की दुनिया में।
कई बरसों से दिखा ना था,
सुना था किसी को कहते हुए।
यहाँ कोई चिड़िया ना रहती,
धूप लुक छुपकर ना आती थी,
आसमान भी काला था।
लोग दिखे थे कल कुछ पीछे,
पर मुर्दा भीड़ उसे ना भाती थी,
बात यहाँ अब कोई ना करता।
सुना था उसने बरसों पहले,
हँसी ठिठोली हर दोपहर होती थी।
बारिश में बूँदों की टप टप,
सर्दी में दाँतों की किट किट,
किससे कहती कौन यहाँ था।
सुना किसी से लोग यहाँ अब,
डब्बों में कैद रहते थे।
घड़ी की टिक टिक चलती रहती,
घर पर भी वे डब्बों में कैद रहते,
खिड़की से तब भी ना दिखते।

************************

उस दोपहर आँख मूँदकर,
ऊँघ रही थी जब वो।
पत्तों में से जलती धूप पड़ी,
लुक छुपकर आती हुई।
पोंछ पसीने की बूँदों को,
चैन उसे तब आया,
जब देखी वो टूटी टहनी,
और कुरेदी हुई मिट्टी।
कोटर भी था पास में ही,
सोचा उसने भयानक स्वप्न,
सच होता तो क्या होता।
क्या सचमुच ऐसा संसार है,
बिना शीशम के पेड़ का।
जहाँ ना बादल जहाँ ना चिड़िया,
ना आँख मिचोली धूप से।
लोग कहाँ होंगे ऐसे जो,
बुत के जैसे जीते हैं।
मुर्दों जैसे रहते होंगे,
ऐसा कोई संसार है क्या।

अवधारणाएँ




अभी हाल ही में बहुत कुछ ऐसा देखने को मिल रहा है कि कई बार मन सोचने पर मजबूर हो जाता है कि हम अपने आस पास कैसा माहौल बना रहे हैं।

एक पुराने मित्र के विवाह समारोह में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वहाँ कुछ पुराने सहपाठी भी मिले जिनसे अब सम्पर्क ना के बराबर है। तो हुआ यूँ कि इतने सालों बाद मिलने पर वही सामान्य परिचय के बाद थोड़ा हल्का माहौल करने की कोशिश शुरु हो गई, जिसमें कई पुराने किरदार वैसे ही दिखने लगे जैसे वे वर्षों पहले थे।

सभी हल्का फ़ुल्का मज़ाक जारी रखते हुए शाम का मज़ा ले रहे थे। बातों बातों में लोग कई समसामयिक मुद्दों पर अपनी राय सामने रखने लगे। ज़ाहिर है इतने वर्षों बाद हर इन्सान में भारी बदलाव आ जाता है। कई लोग एक दूसरे से बहुत ही अलग वातावरण और सामाजिक परिवेश में ढले हुए होते हैं, अपने अलग विचारों, धारणाओं और व्यक्तित्व के साथ। और बहुत बार ऐसा होता है कि ये सभी समीकरण लोगों को एक दूसरे के विरुद्ध कर देते हैं। यही होने भी लगा, जो कि बिल्कुल सामान्य सी बात है।

आम तौर पर जब आप इतने वर्षों बाद घनिष्ठ नहीं रहते तो एक सामाजिक मर्यादा होती है कि आप विरोधाभासी विचारों पर एक शांतिपूर्ण चर्चा करने लायक परिपक्व रहें। यहाँ अजीब बात यह हुई कि बड़े बड़े मुद्दों के विरोधाभास तो बहुत ही शांति से नज़र अन्दाज़ कर दिये गये लेकिन जब थोड़ी देर बाद बातचीत व्यक्तिगत जीवन की ओर मुड़ गई तब तक वहाँ कुछ लोगों के मन में विरोधाभासी पक्ष के प्रति नकारात्मक धारणाएँ बन चुकी थीं ।
इस हद तक माहौल में हल्का हल्का तनाव घुल रहा था कि जब भी कोई अपने जीवन, अपने अनुभवों या अपनी आदतों के बारे में कुछ मज़ाक करता तब सामने से कुछ लोग उन विपरीत तथ्यों पर उसे नीचा दिखाने की कोशिश करने लगते। हालाँकि उनमें से कई लोगों ने यह बताया कि इसे हल्के में लेकर भुला दिया जाए क्योंकि वे सिर्फ़ समय काटने के लिये विरोधाभासी व्यक्तित्वों पर गहरे कटाक्ष कर रहे हैं और इतना 'कूल' तो सभी को होना चाहिए पर धीरे धीरे यह महसूस किया जा सकता था कि जिन लोगों पर बार बार वार किया जा रहा था वे या तो चुपचाप सबकी बातें सुनने लगे या दूसरे समूहों में शामिल होने चले गए, सीधे शब्दों में जो एक खुशनुमा माहौल भिन्न भिन्न अनुभवों से हर किसी के व्यक्तित्व में कुछ नया जोड़ सकता था वह एक नकारात्मक माहौल में बदल गया और बाकी की शाम में ऐसा कुछ दोबारा हो नहीं पाया।

मेरा मन यह सोचने पर मजबूर हो गया कि आज से कई वर्षों पहले जब हम ना तो इतने कूल थे ना ही इतने आधुनिक कि स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने की होड़ में दूसरों के व्यक्तित्व को तिरस्कृत करें तब अन्जान लोगों से वार्तालाप करना बड़ा ही सरल था। क्योंकि तब सभी को आदत थी कि कई मुद्दों पर बहस करके भी रात को जब सोने जाएँ तो कुछ नया सीखने का सन्तोष रहे मन में और आप इतिहास में जाकर देखें तो महान लोग अपने विरोधियों का सम्मान करने की परिपक्वता लेकर चलते थे। इसीलिए पंचायतों में या परिवारों में चर्चाएँ और निर्णय लेना आसान होता था। लोगों को एक दूसरे से सीखना सम्मान की बात लगती थी, लोग अपने आप से मतलब रखने से ज़्यादा अपने आस पास के जीवन को लेकर चलने वाले होते थे।

उस एक शाम में मुझे लगा कि कुछ लोग वैसे ही रहते हैं जैसी वो अपनी सोच बना लेते हैं, वे सही तो सब सही अन्यथा सब बकवास है, उन्हें जैसा जीवन जीना है वही पैमाना है, वे कभी बड़े नहीं होते चाहे कितने ही ओहदे या शहर बदल लें। और मज़े की बात यह है कि इन में से कई लोग आपको सोशल मीडिया पर इन्सानियत, महानता, भाईचारे के बारे में रोज़ रचनात्मक टिप्पणियाँ अपडेट करते हुए दिखेंगे । इनके सोशल मीडिया प्रोफ़ाईल देखकर आपको लगेगा कि जातिवाद, मानवाधिकार जैसे गम्भीर मुद्दों पर इनकी सोच इतनी अच्छी है कि ये उस श्रेणी में नहीं आते जो खाली समय में लोगों के बारे में बातें करते हों अपितु समाज में कुछ भला करने का सतत् प्रयास करते रहते हैं।

मन तब खिन्न हो जाता है जब यहाँ आपको पर्दे के पीछे दूसरी छवि देखने को मिलती है जो सोशल मीडिया के बाहर वही पुरानी लोगों की आलोचनात्मक टिप्पणी करके स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने की सोच मानती है। यह जो ट्रेंड है सचमुच काफ़ी ट्रेंडिंग हो चुका है अब। फ़िर इनमें और बाकी लोगों में क्या अन्तर रहा? आप ही सोचिये आज के समय में लोगों से बात करने के अवसर कितने कम मिलते हैं, आस पास का माहौल इतना थका देने वाला, भाग दौड़ भरा और नकारात्मक हो गया है और इसमें भी यदि आप किसी अन्जान को बुरा ही महसूस करवाएँ तो एक इन्सान के तौर पर आप कौन सा योगदान दे रहे हैं समाज में।

जीवन बहुत छोटा है, आपको यह भी नहीं पता कि जिससे आप आज मिले हैं कल वह जीवित रहेगा भी या नहीं या आपके शब्दों का उसके मन पर क्या प्रभाव पड़ेगा । बहुत महान काम करने की अपेक्षा तो रखनी भी नहीं चाहिए और ना ही कोई किसी से रखता है आज के समाज में, पर अगर आप दो शब्द प्रोत्साहन या रचनात्मक ऊर्जा के नहीं दे सकते तो आप कौन सी तरंगें अपने आस पास बना रहे हैं जो निरंतर फ़ैलती वैचारिक हिंसा को कम करे या लोगों में विश्वास, प्रेम या दोबारा वैसा वातावरण बनाने में मदद करे जिससे असल जीवन में भी कोई योगदान दिया जा सके और इंटरनेट के बाहर भी व्यक्तिगत निर्णयों और धारणाओं का सम्मान करने के शब्द गूँजें और अभिव्यक्ति के अधिकार को जीने के उदाहरण दिखें।

ज़रा सोचिये इस बारे में।

Wednesday, 8 April 2020

लहरें



तुम
जैसे कोई शांत सागर
बर्फी़ले पर्वत का शिख़र
सुबह की सीधी रोशनी

मैं
जैसे कोई अधीर लहर
प्रबल अग्नि की तीव्र चिंगारी
रात की सुगबुगाहट का साया

इतने अलग पर जब मिले,
उलझनें आसान हो गईं|
पिछली सारी लकीरें मिल गईं,
धारणाओं की सभी दीवारें ढह गईं|

मेरी बरसती बूंँदों पर उड़ती धुंध हो तुम,
चंचल मन में चलते सफ़र का सीधा रास्ता हो तुम|

हर दिन मेरी कल्पनाओं की सैर करते,
शब्दों धुनों किस्से कहानियों शहरों में झाँकते हुए
आकाश के नीचे धरा पर मेरा तारामंडल हो तुम|

कल्पनाओं से वापस आकर,
दिन के अंत में मेरा घर हो तुम|

कभी लिखेंगे दो अलग लहरें किनारे पर कैसे मिलती हैं
तब तक हाथ थामे रोज़ थोड़ा पिघलते हुए चलते हैं|

कोरोना में Quarantine

कोरोना वायरस उतना खतरनाक नहीं है जितना हम उसे बना रहे हैं। बिल्कुल, यह एक तेज़ी से फ़ैलता हुआ वायरस है जिस पर काबू पाना मुश्किल हो रहा है लेकिन इसकी वजह सिर्फ़ यह नहीं है कि यह लाइलाज है या हम इसकी फ़ैलने की गति कम करना नहीं जानते । सबसे बड़ी वजह यह है कि हम इसे फ़ैलने दे रहे हैं, ना सिर्फ़ यह हम अनजान बनकर इसे फ़ैलाने में पूरा सहयोग दे रहे हैं। और यह मैं हवा में तुक्का लगाकर नहीं कह रही हूँ। यहाँ मुम्बई में रोज़ लोगों को 'आईसोलेशन' शब्द की अव्हेलना करते हुए देखकर कह रही हूँ।

सरकार ने एक लिस्ट जारी की है जिस में साफ़ साफ़ दिया गया है कि essential और non-essential विभाग कौन से हैं, किन्हें work from home की सुविधा मिल सकती है और कौन कम manpower में काम कर सकते हैं। अगर आप non-essential विभाग में हैं तो अब तक आपको work from home मिल चुका होगा और आप अपने घर से ऑफ़िस का काम कर रहे होंगे कई दिनों से, अगर आप student हैं तो आपके स्कूल, कॉलेज बन्द हो गए होंगे। आप कई दिनों से घर पर होंगे, समय काटते हुए, पर आपके घर में पानी समय पर आ रहा है, बिजली भी पहले की तरह है, सफ़ाई हो रही है बाहर, कहीं ज़रुरी काम से जाना हो तो बस, ऑटो, ट्रेन, हवाई यात्रा सब तो कर सकते हैं आप। और तो और घर में राशन या सब्ज़ी खत्म हो जाए तो आप आराम से बाहर जाकर ला सकते हैं, बाज़ार खुला है। बीमार पड़ जाएँ तो डॉक्टर अभी भी 24 घन्टे उप्लब्ध हैं।

कभी सोचा है घर पर रहते हुए आपको बिजली, पानी, सफ़ाई, यातायात, राशन, किराना, स्वास्थ्य सेवाएँ पहले की तरह सब कुछ कैसे मिल रहा है। कैसे आप जब मन चाहे इन सेवाओं का लाभ उठा पा रहे हैं। क्योंकि आपके लिये इस पूरे सिस्टम को चलाने वाले लाखों लोग ऐसे हैं जिन्हें work from home की सुविधा नहीं मिली है। ये लोग रोज़ घर से निकलकर, खतरे का सामना करते हुए आपके quarantine period को बिना रुकावट चलने दे रहे हैं। आप जहाँ घर पर बोर हो रहे हैं, शिकायतें कर रहे हैं, सिस्टम कैसे चलना चाहिए इस पर अपनी राय दे रहे हैं, क्योंकि आप घर के अंदर 'safe' hain, वहाँ ये सभी लोग इन सब बातों को सोच ही नहीं पा रहे हैं। क्योंकि इनके लिये अब भी ज़िन्दगी थमी नहीं है, ज़्यादा तेज़ चलने लगी है। हाँ कई sectors में कमी आई है पर कईयों के लिये काम बढ़ गया है। काम के साथ अब सुरक्षा की ज़िम्मेदारी बढ़ गई है। सुरक्षा, खुद की, परिवार की, आस पास वालों की और उनकी जिनके लिए वे काम कर रहे हैं। क्योंकि इस सुरक्षा में सेंध लगने से सब बिखर जाएगा यह वे लोग जानते हैं। तो एक तरह से उन पर ज़िम्मेदारी कई गुना बढ़ गई है।

हमने स्कूल की किताबों में fundamental rights यानि अधिकारों के बारे में पढ़ा था और सच मानें तो आजकल सब अधिकारों की ही बात करते हैं। क्या किसी को याद है कि वहाँ fundamental duties यानि कर्तव्य भी पढ़ाए गए थे। हाँ वही कर्तव्य जो हम एक नागरिक के तौर पर भूल गए हैं। एक समाज में रहने के नैतिक कर्तव्य जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए। कितने लोग आज अपने कर्तव्यों के लिए लड़ते हैं। अब आप यह सोचिए कि आप अपने घर में बैठकर अथाह समय का उपयोग किसी भी प्रकार करें पर आपका नैतिक कर्तव्य क्या है इस कठिन समय में। अब आपके लिए जीवन सिर्फ़ इतना बदला है कि आप बाहर की दुनिया अपने हिसाब से नहीं घूम सकते। Essential services में लगे मेरी तरह और कई लोग हैं। हमारा काम किसी कोरोना की वजह से नहीं रुकेगा। एक बीमार हुआ तो किसी और को आकर करना पड़ेगा क्योंकि हमें यह सुनिश्चित करना है कि आप जैसे लोगों को quarantine period में कोई असुविधा ना हो। मैं फ़िर भी मुम्बई एअरपोर्ट पर अथॉरिटी में हूँ मुझे कुछ सुविधाएँ मिल जाती हैं। मैं अपनी सुरक्षा करने की कोशिश भी कर रही हूँ काम पर जाते हुए। मेरी ही पहचान के कई लोग पॉवर, रेल्वे, पेट्रोलियम से जुड़े sectors में हैं जिनका काम जारी है पर हम फ़िर भी सुरक्षित हैं।

और अब आप उन लोगों के बारे में सोचिए जिनके पास basic facilities नहीं हैं, जो गरीब तबके के हैं, आपके लिए रोज़ खतरा उठा रहे हैं और आपके सारे काम चलने दे रहे हैं। आप की भाषा में janitors, pumping station workers, electricians और भी कई लोग। इनके पास ना इतना समय है कि आपकी opinions पढ़ें ना ही इतना सुकून। इनमें से कई daily wage workers होते हैं जो ऐसे समय में भी अपना काम चलाने की कोशिश कर रहे हैं, सारे सुरक्षा नियमों से लड़ते हुए, अस्पतालों में, सड़कों पर, दुकानों में, कारखानों में, ऐसी जगहों पर जहाँ काम करना ही है।

व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले लोगों को बता दूँ कि मुम्बई एअरपोर्ट पर चीन और दक्षिण पूर्वी एशिया से आने वाले यात्रियों की जाँच फ़रवरी की शुरुआत से ही होने लगी थी, यूरोपियन देशों से आने वालों की मार्च की शुरुआत से और बाकी देशों से आने वालों की जैसे ही वहाँ संक्रमण का पता चला। (हम यहाँ दिन रात देश में आने वाली flights का समय, अनुमति, कैसे आना है, कहाँ जाना है सब देख रहे हैं हमेशा से, सुरक्षा से अपना काम करते हुए)। जाँच में यदि आप में लक्षण हैं तो आपको वहीं रोककर quarantine facility में भेजा जाता है, वहाँ भी कई लोग सुविधाओं की कमी की शिकायत करते हैं यह भूलते हुए कि उन्हें संक्रमण रोकने के लिए वहाँ रखा गया है। अब कई यात्री visible symptoms को छिपाने के लिए दवाएँ लेकर land करते हैं जिससे तत्काल समय के लिए कोई लक्षण ना दिखें, ज़ाहिर है screening में सही पाए जाने पर उन्हें centre में ना रखकर self quarantine होने को कहा जाता है एक seal लगाकर जिससे वे सुरक्षित रहें और दूसरों को भी सन्क्रमित ना करें। यह 14 दिन का समय होता है क्योंकि यह वायरस आपके शरीर से लड़ता है और जिस दिन आपकी प्रतिरोधक क्षमता पर हावी हुआ आप 14 में से सिर्फ़ उसी दिन से सन्क्रमित पाए जाएँगे।

Self quarantine का मतलब है कि आप तुरंत किसी जगह पर स्वयं आईसोलेट हो जाएँ। पर यहाँ भी लोग अपने यात्रा विवरण छिपाते हुए आगे किसी और साधन से यात्रा पर निकल जाते हैं। इतने स्वार्थी होकर कि ट्रेन, ऑटो, सहयात्री सबको संक्रमण फ़ैलाते हुए जिसका पता 15 दिन बाद चलेगा और तब तक यह एक Geometric Progression की तरह बढ़ चुका होगा। आप बाहर से आते हैं और देश के सुदूर इलाकों में सब कुछ जानते हुए भी सबको खतरे में डालते हैं। आप पढ़े लिखे समझदार हैं आपको मालूम है कि घर से बाहर सोच समझकर निकलना है क्योंकि आप अपने साथ कई लोगों की जान खतरे में डाल रहे हैं। फ़िर भी आप बाहर घूमने निकल रहे हैं, खाने जा रहे हैं, भीड़ में इकट्ठा होकर पार्टी कर रहे हैं, बोरियत दूर कर रहे हैं तो आपके लिए क्या किया जाए। आपको लगता है यह बीमारी आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी पर आप यह भूल जाते हैं कि यह आपके किसी अपने को आसानी से चपेट में ले लेगी या किसी और के अपने को। या तो आप यह भूल गए हैं कि quarantine period vacation नहीं है या आप निहायती इग्नोरेंट हैं। इतना तो वो workers भी समझने लगे हैं जिन्हें इसके बारे में पता नहीं था। वो बेचारे तो कभी देश से बाहर गए भी नहीं लेकिन डर में तो वो भी जी रहे हैं।

यह सब जो ऊपर उदाहरण दिए हैं काल्पनिक नहीं हैं, ऐसा लोगों ने किया है। अभी कुछ घंटों पहले पता चला कि जहाँ लोग अभी तक सुरक्षित थे वहाँ भी ऐसे लोग पहुँचकर संक्रमण फ़ैला चुके हैं और अब वहाँ के अधिकारी पता कर रहे हैं कि कौन कौन affected हो सकता है। ना सिर्फ़ काम बल्कि खतरा भी बढ़ा। इन लोगों को अब भी centre में quarantine होने में तकलीफ़ है। हद तो तब हो गई जब पता चला कि कल रात एक domestic flight में 4 यात्री ऐसे थे जिन्हें self quarantine में होना चाहिए था। जानकारी मिलने पर कार्यवाही की गई पर आप मूर्खता की सीमा समझिए। कितने लोगों की जानें जोखिम में डाली गईं। ये लोग किसी और देश में होते तो इन्हें quarantine नहीं जेल में भेजा जाता पर हमारे यहाँ तो चल जाता है सब।

जिन्हें समस्या अभी भी गम्भीर नहीं लग रही उन्हें यह जानकारी होगी कि इटली में अब क्या हालात हैं। जिस तरह से हमारे देश में लोग जा रहे हैं छोटे शहरों में शुरुआत हो ही चुकी है, अब अगर गाँव देहातों में भी हो गई तो मुश्किल हो जाएगी। मुम्बई के ही slums में शुरुआत होना खतरनाक है। हमारे आपके घर, कार्ड्स, पहचान पत्र, यात्रा, कॉन्टैक्ट्स, मकान नम्बर पता करना आसान होता है, उनका नहीं। और यहाँ से सब black hole zone में चला जाता है। अब आप पता करते रहिए।

इतना कुछ लिखने का मतलब तभी होगा जब आप अपनी ज़िम्मेदारी समझेंगे। आपका कर्तव्य। किसी को भी आपकी ताली या शाबाशी नहीं चाहिए। आप बस एक छोटा सा योगदान दें। जब तक ज़रुरी ना हो घर से बाहर ना निकलें, संक्रमण कम करने में मदद करें। आप से मिले इसी योगदान को हम सम्मान समझकर आभारी रहेंगे। आप व्यायाम घर पर भी कर सकते हैं, लोगों से मिलने के बजाय फोन पर बात कर सकते हैं, इंटरनेट का उपयोग कीजिए, कोई नई विधा सीख लीजिए , आत्ममंथन कर लीजिए । दवाएँ, राशन, दूध मिलता रहेगा, ऑनलाइन भी और दुकानों पर भी।

बस एक ही विनती है, जैसा कि सभी कहते हैं

"हम आपके लिए काम पर रुके हैं, आप हमारे लिए घर पर रुक जाईए ।"

~This is not just my voice, but of those involved in all essential services these days, including our Air Navigation Services.

Tuesday, 7 April 2020

मोड़





जीवन मृत्यु के खेल में
आँंख मिचौली चल रही है,
मैं भोला मानुष अबूझ यहांँ
समय के फ़ेर को अनन्त मान,
बैठा हूंँ इस मोड़ पर
जब सफ़र अधूरा लगेगा,
फ़िर चल दूंँगा,
और थककर फ़िर मिलूँंगा
ऐसे ही किसी और मोड़ पर,
अबोध मन में ढेरों सवाल लिए,
फ़िर नई रात बुलाएगी,
फ़िर नई बाट निहारेगी,
मैं भोला मानुष ही सही,
जवाब तलाशने चलता रहूंँगा

मुसाफ़िर




मैं मुसाफ़िर
चला फ़िर से
इस शहर से उस शहर

कभी भटकता किसी सड़क पर
फ़िर मंज़िल पा जाता
कभी कोई अनजान मोहल्ला
घर अपना बन जाता

लेकर मन में
सपने सारे
उम्मीदें और यादें
कुछ भोले से
कुछ क़रीब से
मन के मेरे सपने
कुछ अनजाने
कुछ अपने से
उन लोगों के चेहरे
भूले बिसरे
फ़िर से मिलने की फ़रियादें
बांँधकर अपने मन की डोरी
फ़िर से चला घरौंदा

मैं मुसाफ़िर
चला फ़िर से
इस शहर से उस शहर

Friday, 11 November 2016

श्री रामाधार मिश्र(नानाजी) कहते थे



आज मेरे नानाजी का देहान्त हो गया. उम्र तो इतनी अधिक ना थी पर शायद समय आ गया था. मैंने आज से पहले कभी अपने आपको इतना लाचार नहीं पाया कि चाहे कुछ भी कर लूँ पर अंतिम क्रिया के पहले नहीं पहुँच सकती. ऐसे समय में याद आता है कि घर से दूर और अकेले हैं, और कोई मदद भी नहीं कर सकते. एक इच्छा अंतिम दर्शन की. 

बस अब रह रहकर नानाजी के विचार मन में आ रहे हैं, और अपने होश संभालने से अब तक उनकी यादें सामने आ रही हैं. मेरे नानाजी पंडित श्री रामाधार मिश्र जी , बिजावर के एक विशिष्ट नागरिक थे, जिन्हें सिर्फ़ बिजावर में ही नहीं, छतरपुर जिले और बुंदेलखंड क्षेत्र में दूर दराज़ के हिस्सों में भी उनके नाम से पहचाना जाता था. और यह नाम उन्होंने अपनी कर्मठता, सेवा भाव, निष्ठा और ईमानदारी से कमाया था. लोग उन्हें सिर्फ़ एक विख्यात और ईमानदार वकील के रूप में नहीं जानते थे, बल्कि उनके सादा जीवन, दयाभाव और सही रास्ते पर चलने के साहस का आदर भी करते थे. उनके राजनैतिक या कार्यकाल संबंधी किस्से बताने के लिए मैं सही व्यक्ति नहीं हूँ. मैंने उन्हें सिर्फ़ उतना जाना है जितना देखा. अवश्य ही कई ऐसे ज्ञानी, सम्मानीय, और उनके करीबी लोग होंगे जो उनके सुनहरे कार्यकाल पर प्रकाश डालेंगे. मैं तो सिर्फ़ उनकी नातिन हूँ, और उन्हें नानाजी के रूप में ही जाना है. 

जब मैं छोटी थी, तब तो छुट्टियाँ सिर्फ़ नानाजी के घर पर बिताने के लिए होती थीं, माँ जाएँ या नहीं, मैं तो जाती थी. बिजावर का मतलब मेरे लिए बस मौसियों, मामा और भाई-बहनों से मिलना होता था. कभी कभी सुबह हम बच्चे नानाजी के बड़े से फ़ार्म हॉउस घूम आते थे. नानाजी और नानीजी ने वहाँ भी एक मंदिर बनवाया था, हनुमान जी का. मेरे बचपन की धुंधली यादों में उस मंदिर में बैठकर पूजा करना और वापस आते समय फूल लेकर आना अब भी है. नानाजी नियम और वचन के पक्के थे. कोई भी चीज़ उनके नियम नहीं बदल सकती थी. कितनी बार हम बच्चे उन नियमों को बदलने की कोशिश करते थे, पर नानाजी भी तो हमारे ही नानाजी थे. पूजा के बाद घर के सभी लोगों को चन्दन लगाना और आरती देना जब तक नहीं होता था, वे उठते नहीं थे. 

जब नानाजी कोर्ट जाते थे, तो हम बच्चे थोड़ी बहुत शैतानी भी करते थे और हमारी मौसियाँ भी खेलने के साथ हमें खाने के लिए कुछ न कुछ नया बनाकर देती रहती थीं. फ़िर शाम को नानाजी और नानीजी के साथ मंदिर जाना होता था. मंदिर जाने की याद मेरी सबसे सुखद याद है अब तक. हम नानाजी के कोर्ट के सामने से जाते थे. उतने लंबे रास्ते में हर २ कदम पर कोई न कोई उन्हें नमस्कार वकील साहब कहते हुए निकलता था. मेरे मानस पटल पर जानकी निवास मंदिर, मंशापूर्ण मंदिर , खेल का बड़ा मैदान, राम निवास मंदिर, और हनुमान जी की कुटी, और उसके पीछे का बरगद का पेड़ सब अभी तक अंकित हैं. मंदिर के पंडित भी नानाजी को जानते थे. रास्ते में नानाजी पाठ करते जाते थे और नानीजी हमारी धर्मग्रन्थों की जानकारी बढ़ाती जाती थीं, हमारे सवालों का जवाब देकर. नानाजी की बैठक में सैंकड़ों कानून की किताबें थीं. वे नए नियमों और पुराने केसेज़ को ध्यान से पढ़ते थे. बिजावर से जाने के बाद उन्होंने वे सभी किताबें एक लाईब्रेरी को निःशुल्क दान कर दी थीं. कहने लगे कि यहाँ रखने से अच्छा है कोई इनसे पढ़कर कुछ सीख ले. 

नानाजी घर आकर भी घर के हर सदस्य के बारे में पूछते थे, चाहे कोई भी हो. अपने व्यस्त दिन के बाद भी उन्हें अपने सभी बच्चों और उनके भी बच्चों का ध्यान रहता था. सबने भोजन किया या नहीं, किसी की तबियत ठीक नहीं हुई तो उसके पास बैठकर सहलाना नानाजी अक्सर किया करते थे. घर के छोटे बच्चों को तो वे अपने पास ही बैठाकर कहानियाँ सुनवाते थे या खुद सुनाया करते थे. एक धार्मिक पत्रिका है 'कल्याण', जिसका नाम शायद बुज़ुर्ग लोगों ने ही सुना होगा. नानाजी ने उसकी आजीवन सदस्यता लेकर रखी थी.  मेरा पढ़ने का शौक वहाँ  भी काम आया. और फ़िर नानीजी से उन बातों पर लंबे संवाद होते थे, लगता था कि नानाजी सुन नहीं रहे पर जैसे ही हम कुछ गलत बोलते थे वो तुरंत हमें सही करते थे. राजनैतिक मुद्दों पर नानाजी बहुत देर तक चिंतन किया करते थे. नानीजी से तो मैं अब भी बातें कर लेती हूँ, पर नानाजी से जब बातें करने लायक समझ आयी तब तक वे इन मुद्दों पर ज़्यादा नहीं बोलते थे. 

मुझे अच्छी तरह याद है कैसे नानाजी दिन में कोर्ट जाने से पहले भगवान् के पाठ और हवन पूरे करके जाते थे, चाहे भोजन करें या नहीं. उनके राम रक्षा स्तोत्र के श्लोक अब भी मेरे कानों में गूँजते हैं जो वे पूजा के कमरे में बैठकर बिना किसी रुकावट के करते थे. शायद नानाजी का धार्मिक होना घर के सभी लोगों में कुछ मूल्यों को पत्थर की तरह बिठा गया. मुझे याद है जब मैंने स्कूल जाना शुरू किया था. उन दिनों हम जबलपुर में नहीं रहते थे. मेरे पिताजी की पोस्टिंग सागर में थी. और वहाँ से बिजावर बस ६ घंटों की दूरी पर था. तब घर पर लैंडलाइन फ़ोन नहीं था. मैं हर हफ़्ते बिजावर चिट्ठी लिखा करती थी. और नानाजी उसे भोजन के समय ज़ोर से पढ़वाते थे. फ़िर किसी मौसी या नानीजी से जल्दी उसका उत्तर लिखवाते थे. एक हफ़्ते के अंदर मुझे जवाबी चिट्ठी मिल जाती थी. 

ये बात तब की है जब मैं चिट्ठियाँ लिखने के लिए बहुत छोटी थी, शायद ४ या ५ साल की. नानाजी को माँ ने बताया कि मेरा एडमिशन सागर के सबसे अच्छे स्कूल सेंट जोसफ'स कॉन्वेंट में हो गया है. जब अगली छुट्टियों में मैं बिजावर गयी तो नानाजी ने माँ से कहा कि अब ये हिंदी कैसे सीखेगी. मेरी माँ भी उन्हीं की बेटी हैं. उन छुट्टियों में नानीजी ने मुझे हिंदी की गिनती सिखानी शुरू की. जब मैं वापस आयी तो मेरी माँ ने उसे जारी रखा और साथ ही बहुत कुछ सिखाया. अगली छुट्टियों में जब मैं बिजावर गयी तो नानाजी ने सोचा कि पूछा जाए कितना भूल गयी. जब मैंने उन्हें पूरी हिंदी की गिनती सुनाई तो वे खुश हो गए पर उससे भी अधिक ख़ुशी उन्हें तब हुई जब मैंने नानीजी के साथ बैठकर सभी मौसियों के सामने राम रक्षा स्तोत्र संस्कृत में पढ़ा. उसके बाद स्कूल में हमेशा मैंने अपनी हिंदी और संस्कृत सभी से अच्छी पायी. ये हमारे घर के वातावरण का असर कहा जा सकता है कि आज इतने वर्षों बाद भी हिंदी और संस्कृत मुझे नानाजी और नानीजी की उस बात को याद दिलाते हैं और ख़ुशी महसूस करवाते हैं कि मैं कहीं भी पढ़ी, कहीं भी रही, अब भी बिलकुल वही हूँ. नानाजी को मेरे अंग्रेजी वाद-विवाद की रिकॉर्डिंग्स सुनना भी पसंद था. उस पर वे अपने विचार ज़रूर बताते थे. 

मैं जैसे बड़ी होती गयी, मैंने अपने परिवार को और करीब से देखा. मौसियों की शादियाँ, नानाजी और नानीजी का रहन - सहन मैंने बहुत गहराई से जाना. इसीलिए मैंने अपनी  मौसियों में सहेलियाँ पायीं. जब मैं अकेली थी, तब शायद इसीलिए मामा के साथ इतने साल बिताने का समय मिला कि आज भी  उनकी भांजी से ज़्यादा परिवार के बच्चों में उनकी सबसे अच्छी दोस्त हूँ.  कभी कभी मुझे गर्व होता है और ख़ुद को भाग्यशाली महसूस करती हूँ कि मैं और मेरे माता-पिता बिजावर में नानाजी, नानीजी, मौसियों, मामा और अपने भाई-बहनों से सबसे अधिक जुड़े रहे. आज भी लगता है कि वो अपनापन मुझे सबसे बांधे रखता है सुख-दुःख में चाहे हमें मिले हुए कितने भी दिन हो गए हों. 

मैंने नानाजी को बाहरी अनजान लोगों पर दया दिखाते हुए भी बहुत देखा. जब समझ आयी तो मैंने पाया कि हमारे घर में कई बार गरीब लोग दूर दूर से आते थे. दरवाज़ा खोलने पर एक ही रट , "मिश्राजी  वकील साहब से मिलना है."  इन में से कई ऐसे होते थे जिनके पास कोर्ट केस की फीस देने के  पैसे नहीं होते थे, या जो बिजावर के दूसरे लालची वकीलों द्वारा पीड़ित थे. वे नानाजी के पास आते थे. नानाजी  मुफ़्त  में उनकी मदद करते थे क़ाबिल तो वे थे ही(उनकी डिग्री और काम से). मेरी माँ ने वकालत करने से पहले कई बार नानाजी के कागज़ संभाले थे. वे बताती हैं कि नानाजी ने हमें कहकर रखा था कि ऐसे लोगों को भोजन-पानी देना और ज़रूरत के लिए पैसे देना. कई बार  बाहर से आये लोगों को रात का आश्रय भी मिलता था. भूखों के लिए भोजन और भंडारे भी नानाजी अखंड रामायण के साथ करवाते थे. नानाजी कहते थे जितना कर सकते हैं करना चाहिए. उनके  इस नियम का पालन घर में हमेशा किया गया. 

आज यूँ तो आँसू मैंने भी बहाये पर फ़िर सोचा कि एक अच्छे जीवन को जीने की सीख देने वाले ऐसे ज्ञानी और दानी व्यक्ति को उनके जीवन के लिए याद रखा जाना चाहिए, (और वह भी हिंदी में) जिससे हम भी उनके आदर्शों का पालन करें. तभी सोचती हूँ आज देवउठनी एकादशी का दिन ही चुना ईश्वर ने उन्हें अपने साथ मुक्तिधाम ले जाने के लिए. वैसे तो बिजावर मेरे लिए सागर और जबलपुर से भी ज़्यादा करीब है, नानाजी भले ही गुवाहाटी या वड़ोदरा में रहे हों,और लोग अब भी घर और हमें देखकर कहेंगे कि ये मिश्राजी वकील साहब के घर से हैं, और इस पहचान पर मुझे गर्व है, पर मेरे मानस पटल पर उनकी जो छवि सबसे पहले उभरती है, वह है पूजा के कमरे में या शाम को बैठक में राम रक्षा स्तोत्र के १०८ पाठ  करने की सीधी छवि  और उनकी गूँजती हुई आवाज़,

 "राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
    सहस्त्रनाम तत्तुल्यम रामनाम वरानने ॥ "
                                  
                                        
                                       

Wednesday, 31 August 2016

क्षितिज के पार


आज ख़ुद को फिर से देखा,
दर्पण में नहीं, वरन एक सफ़र पर,
जैसे मैं कोई दर्शक हूँ भीड़ में,
और मंच पर कहानी चल रही हो मेरी.... 

देखा एक मासूम अक्स हवा के जहाज़ों पर,
जो लिए था तलवार पूर्वाग्रहों को ध्वस्त करने के लिए,
देखा एक वीर योद्धा को अठखेलियाँ करते हुए,
लक्ष्य तक पहुँचने के जूनून को जीते हुए,
उस वीरान सी सड़क पर ख़ुद को चलते देखा,
याद आये वो ज़माने जब सड़कें समय की मोहताज न थीं,
एक पल को लगा ये मैं नहीं हूँ,
मैं कहाँ सच से परे , बादलों के परे मैं नहीं हूँ..... 

वो रात के अँधेरे में अनगिनत सपनों को मनाना,
असंभव से इलाकों में अपनी सल्तनत बनाना ,
याद आये वो टूटे मोम के रंग और कच्ची पेन्सिलें ,
वो पुरानी किताबें जो दुनिया से दूर ले जाती थीं,
उन पीले पन्नों को ख़ुद को पढ़ते हुए देखा,
जैसे सदियों से मैंने कई धागे पिरोये थे,
मिलीं उन पन्नों में सूखी हुई कुछ पत्तियाँ ,
जिन में शायद अनदेखे शब्द उकेरे थे,
पर बंद हुईं वो किताबें तो सिमट गए वो किस्से,
भूले बिसरे हो गए वो झरोखे, वो पन्ने ,
जो ले जाते थे मुझे क्षितिज के उस पार.... 

जब छलक गया अस्तित्व अनजानी राहों पर,
और समझ न आया मंज़िल है कौन सी मेरी,
नदी के इस पर से सब ओझल होता लगा,
मैंने  मुड़कर देखा तो पाया मैं वहीं हूँ,
उन्हीं इलाकों में नदी के उस पर,
अपनी सल्तनत में अनगिनत परछाइयों  के बीच,
तो समझ आया कि वो दुनिया अब भी मेरी है,
अनछुई, अनदेखी, बाँहें फैलाये मेरे लिए,
देखती हुई मेरी राह, कि मैं जाकर अपना रास्ता चुनूँ.... 

मैं दर्पण भी हूँ और अक्स भी,
मैं दर्शक भी हूँ और नायक भी,
मैं ही वो मंच हूँ, मैं ही कहानी,
मैं जहाज़ भी हूँ और तलवार भी,
मैं योद्धा हूँ, और हूँ लक्ष्य,
मैं वही सड़क हूँ जिस में मैं मुसाफ़िर,
मैं ज़मीन भी हूँ और आसमान भी,
उन वीराने इलाकों की गूँज हूँ मैं,
मैं किताबों के पन्नों में हूँ और टूटी पेंसिलों में,
उन पत्तियों में हूँ और अदृश्य शब्दों में,
मैं झरोखों से निकलती धूप में भी हूँ,
और बादलों से गिरती बूंदों में भी हूँ,
मैं ही तो हूँ  जो इस पार से देखे उस पार,
सूर्य के उदय से अस्त तक मैं हूँ,
समय की सीमाओं के परे  मैं हूँ,
मेरी राह यहीं है, यहीं है वो दुनिया,
जहाँ से मेरा उद्गम होगा फिर से इसी क्षितिज से,
मैं भूत भी हूँ, वर्तमान भी, और भविष्य भी हूँ,
मैं इस कदम से उठकर नए  क्षितिज की ओर अग्रसर हूँ...

Saturday, 30 April 2016

कोल बाज़ारी - The Story of Indian Marriages

Disclaimer- कृपया 'feminists' एवं 'chauvinists' इसमें अपने लिए कोई मसाला ढूँढ़ने की कोशिश ना करें. यहाँ किसी को गलत साबित नहीं किया जा रहा है, बस जो हमारे आस पास होता है, वही बताया जा रहा है.




तो बात शुरू हुई हमारे एक परिचित के परिवार में एक कन्या के विवाह से. ऐसा नहीं है कि यह हमने पहला विवाह देखा था अपने समाज में. परंतु यह आग में घी डालने वाला काम कर गया और हम सोचने पर मजबूर हो गए . तो साहब हुआ यूँ, जैसा कि हर आम आदमी (no offence to Kejriwal) के 'Marriage Process' में होता है. कन्या विवाह योग्य हुई तो माता- पिता को चिंता सताने लगती है. "अभी तो सही उम्र है, अब नहीं हुई तो अच्छे रिश्ते नहीं मिलेंगे", "अब सब तो हो गया, पढ़ लिया तुमने, नौकरी भी कर ली, दुनिया भी घूम ली, अब और क्या चाहिए, शादी कर लो". अगर आप सोच रहे हैं कि ये शब्द माता-पिता द्वारा कहे गए हैं, तो माफ़ कीजिये आप पूरी तरह सही नहीं हैं. 

भगवान लम्बी उम्र दें उन रिश्तेदारों को, उन परिचितों को जिन्हें अपने बच्चों से ज़्यादा चिंता ऐसी कन्याओं की होती है. कितने निष्कपट होते हैं ये. अगर आपको रिश्ते नहीं मिलेंगे, तो ये हर गली मोहल्ले के ऊट पटांग रिश्तों को आप तक लायेंगे , क्योंकि साहब आपकी कन्या की बड़ी चिंता है इन्हें. और यदि इस पर कन्या ने कह दिया "मुझे शादी नहीं करनी", "मैं अपने तरीके से रहना चाहती हूँ", "मुझे अभी अपने career के बारे में सोचना है", "मुझे खुद को समझना है अभी", तो कसम ख़ुदा की तूफ़ान  है. यही रिश्तेदार फ़िर शुभचिंतक बनकर सामने आयेंगे घावों पर नमक मलने को ,"लड़की हाथ से निकल गयी है आपकी", "लगता है पहले से लड़का ढूँढ रखा है", "जी बाहर जाकर ऐसा ही होता है", "अरे खुद को समझने, पढ़ने और कलाकारी के काम तो घर में बैठकर शादी के बाद भी कर सकती हो, कौन सा तुम्हें कहीं जाना है, अंत में घर तो सम्भालना ही है", "कुछ तो माँ- बाप के बारे में सोचो","क्या करोगी अकेले, कोई तो चाहिए"(जी हाँ हमें बचपन से समाज ही बताता है कि  नारी अबला होती है). यदि लड़का हो तो उसे सुनने मिलेगा,"अकेले कब तक रहोगे? घर में बीवी के आने से रौनक आ जाती है. खाना कब तक बनाओगे खुद ही". ये वही रिश्तेदार और पड़ोसी हैं जो आपकी नौकरी लगने से पहले घर आकर आपके माँ-बाप को दूसरे बच्चों की सफ़लता के बारे में Twitter से भी जल्दी बताते थे. 

तो जैसे तैसे कन्या के हाँ कहने पर, यही भले मानस रिश्ते लाते हैं . कुंडली मिलनी चाहिए साहब, और घर परिवार खानदान अच्छा होना चाहिए. जाति के बाहर तो चलेगा ही नहीं. और फिर शुरू होता है कभी ना खत्म होने वाला सिलसिला 'देखने दिखाने ' का. यहाँ तक तो सिर्फ़ कन्या की मुसीबत थी, अब तो लड़का भी फस गया(जो कि पहले ही मुश्किल से खुद को मनाकर लाया है कि शादी करनी पड़ेगी). जब लड़के वाले लड़की वालों से मिलने आते हैं, तो एक माहौल बनता है, उन्हें प्रभावित करने का, क्योंकि जनाब किसी साक्षात्कार में अपना प्रभाव दिखने से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है यह. अगर लड़के वाले प्रसन्न हो गए, तो लेन  देन में कम समस्या आएगी. कन्या के स्कूल, कॉलेज, नौकरी की उपलब्धियाँ गिनकर बताई जाएँगी, और लड़के वाले तारीफ़ में दो-चार शब्द बोल देंगे, क्योंकि इससे किसी को आगे कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला, यह तो कन्या पक्ष के लोग अपने self-esteem को कायम करने के लिए कर रहे हैं. और वैसे भी कन्या चाहे कल्पना चावला ही क्यों ना हो, अगर दाल में तड़का ठीक से ना लगा पाई , तो क्या करेगी अंतरिक्ष में जाकर. 

पर लड़का, अरे साहब उसका भी S.S.B. इंटरव्यू होता है. "कितना कमा लेते हो", "कोई बुरी आदत तो नहीं है", "हमारी लड़की अपने तरीके से रहना चाहती है", "ससुराल में कितने दिन रहना पड़ेगा", "यूँ तो हमारी लड़की एकदम घरेलू और सुशील है पर थोड़ा कम पुराने ख़यालात की है, वैसे भी आज कल नया ज़माना है". अभी लड़का सोच ही रहा है कि माँ और बीवी के बीच कैसे रहेगा, कि एक और सवाल,"शादी के बाद नौकरी करवानी है लड़की से या नहीं". इस सवाल का जवाब लड़के की माँ देंगी,"ये  तो दोनों का फ़ैसला  होगा, अगर कोई दिक्कत नहीं हुई तो बिलकुल कर सकती है"(यकीन मानिए इस में रत्ती भर भी सच्चाई नहीं है).                                    
अब आता है मिलने मिलाने का समय. नहीं, अगर आप सोच रहे हैं कि अब लड़का और लड़की अकेले में कुछ सवाल  पूछ सकते हैं, तो आप गलत हैं, यहाँ परछाई की तरह साथ रहेंगी, लड़की की मौसी/चाची /मामी/बहन या कोई और. अब लड़का और लड़की पचास सवाल मन में रखकर एक घिसा हुआ सवाल पूछेंगे,"आपको कोई समस्या तो नहीं इस शादी से " और जवाब भी वही घिसा हुआ रहेगा ,"जी नहीं." अब किसको क्या पूछना है ये वैसे भी ज़रूरी नहीं है यहाँ. आख़िर  हम एक मोबाइल फ़ोन खरीदने के लिए दस दिनों तक पड़ताल कर सकते हैं, पर शादी तो एक छोटा सा फ़ैसला है, २ मिनट में हो जाना चाहिए. अगर एक बार और इस तरह मिलवा दिया गया, तो साहब हाँ तो है ही, बिना पूछे. पर अभी ड्रामा खत्म नहीं हुआ है, अभी तो बड़े परदे पर सिनेमा दिखाई जानी है.                            
                                                                          
जी हाँ, लेन देन एक ऐसी परंपरा है जो आज से सैंकड़ों साल पहले एक अच्छे प्रयोजन के लिए शुरू की गयी थी. नवविवाहितों को नया जीवन शुरू करने के लिए लड़की वाले कुछ उपहार देते थे. जी अब तो लड़के नौकरी के हिसाब से बिकते हैं. बोली लगायी जाती है.  आई. टी. वाला हो तो ५-६ लाख, सरकारी इंजीनियर हो तो १०-१५ लाख, डॉक्टर हो तो १५-२० लाख, और आई. ए. एस. वाले तो ५० लाख या करोड़ों में बिकते हैं. आख़िर माँ-बाप ने जितने पैसे खर्च किये हैं, वो वसूलने तो पड़ेंगे. लड़की वाले अपने लड़के की शादी में कर लेंगे. यही तो परंपरा है. उस पर दहेज़ का बाकी सामान और एक कार तो बनती ही है, हैसियत के हिसाब से. और फ़िर शादी तो धूम धाम से ही होनी चाहिए, क्योंकि ५० रिश्तेदारों के सामने इज़्ज़त जो रखनी है. और विदाई के समय उपहार तो होने ही चाहिए, बिलकुल लड़के को तराज़ू में तौलकर. यदि इतना हो सकता हो तो बात आगे बढे. 

अजी, इतना तो चलता ही है, आख़िर शादी-ब्याह का मामला है, सस्ते में थोड़ी होगा. एक ही बार तो होता है, क्योंकि यदि ना  भी निभी, तो लड़की वाले और लड़के वाले मजबूर होकर निभा ही लेंगे. लड़के और लड़की से कौन पूछेगा कि कैसे निभ रही है. अगर आप सोच रहे हैं, कि  यह सिर्फ़ arranged marriage का ढाँचा है, तो आप सरासर ग़लत हैं, love marriage तो और भी बड़ी समस्या है. क्योंकि यहाँ लड़का और लड़की पहले ५० तरह की समस्याओं और पूर्वाग्रहों से लड़कर सबको मनाएंगे, पर शादी के लिए यही सब दोहराया जायेगा. कुछ कमी ना रह जाये, लड़की वाले घबराकर करेंगे, और लड़के वाले झूठी इज़्ज़त के लिए. अगर कुछ कम रह गया तो रिश्तेदार क्या कहेंगे, कि इससे अच्छा तो कहीं और कर दी होती, कोई कमी थी क्या. वही रिश्तेदार जिन्हें अपने बच्चों से ज़्यादा दूसरों की कन्याओं और सुपुत्रों की चिंता होती है. 
                                         
ये सिलसिला यहाँ खत्म नहीं होता. "देखो कोई दिक्कत हो तो समझौता करके चलना, सब जगह करना पड़ता है", "विचार ना  भी मिलें, तो बना  लेना आपस में, घर विचारों से नहीं चलता है", "अपने आपको बदलना ज़रूरी है, सबको करना पड़ता है, यही तो शादी होती है". तो एक और शादी को इतने करीब से फिर से देखने के बाद और कई और करीबी लोगों की शादीशुदा ज़िन्दगी देखने के बाद हमारे मन में सिर्फ़ एक ही सवाल कौंधता है. लड़के हों या लड़कियाँ, हमने समाज में लकीर के फ़कीर बनना क्यों सिखाया है. विवाह- इस शब्द का अर्थ होता है, दो लोगों का आपसी रिश्ता, जो एक दूसरे से बँधकर चले. पर यही नहीं है, तो क्या इस समाज में विवाह ना  करना, विद्रोह की श्रेणी में आता है. समाज की हर समस्या का एक ही हल है लोगों की नज़र में- शादी. 

 यही तो स्कैम है जी, इसी की तो हमें जाँच करनी चाहिए. कौन करेगा जी इसकी जाँच (केजरीवाल जी? ). क्योंकि शादी से बड़ी कोल -बाज़ारी हमने तो ना देखी अभी तक. आपने देखी है क्या? क्या आपके दिमाग में वो गाना नहीं बजता,"काला  रे......"

Sunday, 10 April 2016

गूँज



कुछ अलग ही रंग दिखे थे मुझे,
उस किताब के पन्नों की अठखेलियों में,
जैसे मासूम बचपन रूठ जाता है,
पर अलग ना हो पाए अस्तित्व से,
वो सुबह का कुहासा मानो एक रास्ता था,
मुझे उस अनजाने शहर में ले जाने का,
पर वो अनजाना  कहाँ  वो तो अपना ही था,
ज़िन्दगी जैसे  पहली बार हाथ थामकर चली हो,
जब फूलों का शाखों पर होना भी हो,
पर मौसम गुजरने पर शाखें खाली भी हों,
जैसे बारिश की वही बूँदें भिगा गईं हों,
जो मेरे होने का एहसास दिलाएँ मुझे,
जैसे बौछार में शीशम के पत्ते रोकते हों,
उन टपकती बूँदों के सैलाब को,
पर मैं चलती रही, वो टपकती रहीं,
और बियाबाँ में गीली मिट्टी और लकड़ी की खुशबू,
जैसे किसी कोने में मेरी छिपी हुई गहराइयाँ,
मुझे कभी दिखती नहीं पर महकती रहती हैं,
वो बर्फ़ का जमना और पिघलना,
जैसे मेरी कहानियाँ बर्फ़ में घुल गईं हों,
वो कहीं दूर क्षितिज था पर करीब लगा,
जैसे एक हाथ बढाकर मुझे मिल जायेगा,
रात की ख़ामोशी में दूर किसी का सुर,
जैसे मेरे मन के अनसुने राग हों,
और उस ठिठुरन में अपने होने का एहसास,
जाने कहाँ से मुझे खुद में समाते हुए,
वो वादियाँ , वो दरख़्त, वो काफ़िले,
वो  बस सुकून में अपने से लगे मुझे,
उस चिनार  के पेड़ का हवा से लड़ना,
वो गूँज अब भी सुनाई देती है मुझे,
कहीं से वो मुझ जैसे हैं सभी,
तिनकों और मौसमों को पिरोते हुए,
मैं हूँ और वो वादियाँ हैं,
                       दूर ही सही आदतों से बँधे हुए...                     


Saturday, 27 February 2016

मेरे शहर की ख़ुशबू



पर यह  मेरे शहर के बारे में नहीं है, उसके बारे में तो पहले ही मैंने बहुत कुछ लिखा है.  यह तो हर उस शहर के बारे में है जिसे हम सब कभी न कभी छोड़कर पंछियों की तरह अपना बसेरा कहीं और बसाने चले गए. चले तो गए पर क्या हमने सचमुच अपना शहर छोड़ा. हम में से कुछ को शायद कई साल हो गए होंगे उस शहर को देखे हुए और कुछ एक ऐसा पल ढूँढ रहे हैं जब सुकून से अपने शहर को देखें. कहीं गया ही नहीं वो हमारे अस्तित्व से. ग़ौर से सोचने पर आज यूँ ही याद आया कि मैं तो उसे अपने आस पास जी रही हूँ, शायद मुझे लगा ही नहीं कि मैं वहाँ से दूर कोई और बन चुकी हूँ. मैं तो अब भी वही हूँ, शायद इसीलिए इतनी दूर किसी और शहर में भी मुझे अपने शहर की परछाई दिखती है कभी कभी.                                                   
                                                 
आज सवेरे जब मैं उगते सूरज को देखने के लिए बाहर निकली, तो कहीं दूर से एक मधुर गूँज कानों में पड़ी. बरबस ही मुझे अपने शहर की ओर खींच ले गयी वह गूँज. मुझे आज भी याद है जब स्कूल के लिए जल्दी उठना होता था, और माँ जाने कितनी बार पुकारकर हार जाती थीं, तब ना  जाने कहाँ से किसी मंदिर में बजते भजन, कोई अखंड रामायण की गूँज या किसी मस्जिद की अज़ान से मेरी नींद गायब हो जाती थी. सिहरन वाली ठण्ड में जब मैं बाहर निकलती थी तब कुहासे में भी नरमी होती थी, कहीं से शायद किसी हवन कुण्ड का धुआँ गर्मी ला देता था, उस धुँए में भी एक अलग सी सुगंध थी, जो मानो अंतर्मन को पवित्र कर देती थी. सड़क के किनारे लगे पेड़ फूलों की खुशबू से मन को प्रफुल्लित कर देते थे और उस सुबह के सन्नाटे में भी कहीं कोई  सड़क साफ़ करते हुए दिख ही जाता था. आज जब भागती हुई गाड़ियों के बीच खुद को यहाँ की सड़कों पर पाती हूँ, तो वो सुकून वाली सुबह याद आ जाती है.           


                          


परीकथाओं की तरह लगता है अब वो समय जब शाम को दोस्तों के साथ किस्से कहानियाँ सुनते सुनाते ही हम ना जाने कितने देश घूम आते थे और खुद को झाँसी की रानी से कम  नहीं समझते थे. किसी पेड़ पर चढ़ना, कहीं रूठना मनाना, पर बस उस दुनिया के आगे कोई चिंता ना थी, सब कुछ पास ही तो था. सोचती हूँ अगर वो पेड़ इन्सान होता, तो शायद वो भी मुझे याद करता. अब कौन उसकी छाया में बैठकर अनगिनत संसार बनाता होगा. या क्या पता मेरी तरह कोई और अपने अंतर्मन में झाँकने वहाँ  जाता होगा. यहाँ कभी लोगों को मैं जब साथ में त्योहार मनाते देखती हूँ, तो याद आता है कैसे होली, दशहरे, नवरात्रि , दीवाली , क्रिसमस सब पड़ोसियों के साथ ही पूरे होते थे. और हमारे लिए तो छुट्टियों का समय स्वर्ग से कम  ना होता था.

                                                 
                                             

यहाँ जब शाम को घर आती हूँ, तब भूल नहीं पाती कैसे मेरी शामें नदी किनारे बस शान्त मन से लोगों को देखते हुए, उस सुरमयी वातावरण को ग्रहण करते हुए, किसी सड़क पर घूमते हुए, किसी मित्र से ज़िन्दगी के फलसफे कहते हुए, या बस किसी चाट वाले के ठेले पर सब से ऐसे मिलते हुए निकलती थीं जैसे कई साल हो गए हों मिले हुए, और अब तो सचमुच ना जाने कितने साल हो गए लगता है. वहाँ की हवा अब भी मानो छूते हुए गुज़रती है मुझे. उन किनारों पर, उन सड़कों पर जाने अब कौन चलता होगा. यहाँ तो शामें बंद कमरे में, किसी अनजान सड़क पर या किसी भीड़ भाड़ वाले चकाचौंध करते हुए मॉल में गुज़र जाती हैं, अनजाने चेहरों के बीच में.


      


माँ छुट्टियों में नानी, दादी, मौसी, बुआ के घर लेकर जाती थीं अब याद आता है, जब छुट्टियों का अर्थ होता है, बस अपने घर पहुँच जाऊँ एक बार फ़िर. जाने कितने अरसे हो गए वो सारे शहर भी तो मुझे याद करते होंगे ना. यहाँ  की छुट्टियाँ  तो बस अपनी ज़िन्दगी में सुकून के दो पल ढूंढने में निकल जाती हैं. मेरे कॉलेज के रास्ते पर अब जाने कौन गाड़ी भगाता होगा. जाने कौन कहता होगा "चल यार, कल मिलते हैं ". कल तो आता ही नहीं अब. हम शायद बड़े हो गए, और पीछे मुड़कर यादें ही तो हैं बस टोकरी में, जिन्हें  कभी टटोलकर ले आते हैं.                                           
रातों को जब अक्सर जागती हूँ, तो याद आता है, एक वो शहर है मेरा अपना, जहाँ  मासूमियत में कई सपने बुने थे, कुछ पीछे छूट गए, कुछ अधूरे रह गए, कुछ टूट गए, कुछ पूरे हो गए, अबोध मन के सपने. पर मेरे शहर की खुशबू तो साँसों में है, वही तो मुझे बनाये रखती है, मुझे एहसास देती है मेरे होने का, चाहे मैं कहीं भी रहूँ. आखिर ये शहर भी तो किसी का होगा, जो इसे छोड़कर गया होगा, तभी ये मुझे हर बात में मेरे शहर की याद दिलाता है. 

                                         
    





Sunday, 21 February 2016

इफ़्तिताह - ए - सफ़र



Note: Please refer to the Glossary below these lines for Urdu vocabulary. 

गर्त नहीं है मेरा हमसाया मैं तो यहीं हूँ,         
दुआओं की बालीदगी और पासबाँ  बनकर,                                
तूफ़ान निकले कई मेरी तलवार आब-दार बनाकर,   
मैं तो अब भी क़ासिद-ए-सबा, तालिब-ए-उन्स हूँ,     
मुख्तलिब लगी तो मुझे रक़ीब समझ लिया,

रिवायत-ए-ज़माना यही कहता आया है,                                          
एहतेसाब का आफ़्ताब मैंने आफरीन ही किया ,
एहतेराम तो उनका भी और इस ताक़ूब  का भी किया,
नज़र तो अब भी आती है खलिश दुनिया में,
अपनी ही गफलत से परेशान चर्ब - ज़बान लोग,
पादाश की आग में जलते नादिम शख़्स,
जाने कितनी एहतियाज-ए -इफावह  है उन्हें,
जो अँधेरे में नूर देखना वाज़िब ना  समझें,
वो नूर-ए- एजाज़ ढूंढने मैं एक मुसलसल फ़िराक में हूँ,
अमन का एहतेजाज में नहीं ख़ामोशी के रक़्स से रूबरू होने,
ख़ाक में मिले बाहम हो जाते हैं राहत-अफ़्ज़ा बनकर,
ताख़ीर भी हो पर वो आबिद-ए-फ़लक हर रूह के साज़-गार हैं,
जो इफ्शा-ए-सबाह यहाँ मक़बूल बनाकर रहते हैं,
जब एक भी ऐसा राज़दान ना  दिखा यहाँ ,
चश्म-ए -फ़ाख़िर का माद्दा रूह में लिए निकली मैं,
दफ़्न हैं कुछ क़िस्से हाफ़िज़ाह, कुछ इब्तिला बनकर,
मुझे याद हैं वो अख़लाक़ -ए-फ़ाज़िल मेरे बाँकपन के लिए,
जब मैं इस जहाँ की ख़ाक  में सिफर बनकर मिल जाऊँ कभी,
मेरा सफ़र  रहेगा इबारत बनकर कि  मैं एक आबशार रहूँगी,
मौतजा-ए-ख्वाबीदा को जीने के लिए मयस्सर रही,
कैसे मैं अपना तारुफ़ करवाऊँ , मैं तो तूफानों में भी बदस्तूर रही,
वो बेख्वाबी के आलम में ख़ुद से मसरूफ़ होकर ताबीर करने के लिए.


Glossary(as per the above context):
 इफ्तिताह= Honour,
 बालीदगी= Growth,
पासबाँ= Protector,
आब-दार= Polished,
क़ासिद-ए-सबा=Messenger of morning,
तालिब-ए-उन्स= Seeker of love,
मुख्तलिब= Different,
रक़ीब= Rival,
रिवायत= Tradition,
एहतेसाब= Criticism,
आफ़्ताब= Listen/Hear,
आफरीन= Appreciation,
एहतेराम= Respect,
ताक़ूब= Pursuit,
खलिश= Anxiety,
गफलत= Guilt,
चर्ब - ज़बान= Sharp-tongued(here),
पादाश= Revenge,
नादिम= Ashamed,
एहतियाज-ए -इफावह = Necessity for Healing,
नूर= Radiance,
वाज़िब= Justified,
नूर-ए- एजाज़= Miracle of Light,
मुसलसल= Constant,
फ़िराक= Intention,
एहतेजाज= Argument,
रक़्स= Celebration,
बाहम= Together,
राहत-अफ़्ज़ा= Adding to comfort,
ताख़ीर= Delay,
आबिद-ए-फ़लक= Devotees of the sky,
साज़-गार= Favourite,
इफ्शा-ए-सबाह= Disclosing secrets of the dawn,
मक़बूल= Approved,
राज़दान= Trustworthy,
चश्म-ए -फ़ाख़िर= Precious hope,
माद्दा= Substance,
हाफ़िज़ाह= Good memories,
इब्तिला= Suffering,
अख़लाक़ -ए-फ़ाज़िल= Virtue of proficiency,
बाँकपन= Smartness,
सिफर= Nothingness,
इबारत= Composition,
आबशार= Waterfall(Continuous, here),
मौतजा-ए-ख्वाबीदा= Dreams of miracle,
मयस्सर= Available,
तारुफ़= Introduction,
बदस्तूर= Unaltered,
बेख्वाबी= Insomnia,
मसरूफ़= Involved(facing, here),
ताबीर= Interpretation(introspection, here)